Skip to main content

वीर बहुटी
वीरांगना सूजा कँवर राजपुरोहित
मारवाड़ की लक्ष्मी बाई ✊
क्रमशः

  15
बहादुर सिंह हक बक से रह गये
ये क्या हुआ लाडनू में
विश्वस्त लोगों को बुलवाया
बात चीत चली जल्द बाजी में !
16
तभी सूजा पुरुष वेश में
हाथ लम्बी छड  बन्दूक लिये
ठाकुर दादा से हँस कर बोली
में हूँ ना दादा फिर  चिंता किस लिये !
17
जब तक लाडनू की बेटी
सूजा की सांसों में सांसें है
काली गौरी सेना की
परछाई छू जाये क्या दम है !
18
वादा करती हूँ दादों सा
कह बन्दूक हवा मैं लहराई
जीते जी दुश्मन घुस ना पायेगा
कह सूजा ने दहाड़ लगाई !
19
तुरत फुरत सेना गठित हुई
सूजा के नेतृत्व मैं खुल कर
राहु दरवाजा मुख्य मोर्चा
बनाया सूजा ने चुन कर !
20
इन सारी बातों से थी
काली गौरी सेना अंजान
हमला किया लाडनू पर
क्या दम होगा ये मान !
21
जब हमला किया लाडनू पर
उत्तर प्रतिउत्तर मिला बराबर
अंग्रेजों की सेना का मन डोला
विफल हो रहे वो क्यों सरासर !
22
ये क्या यहाँ कहाँ से सैनिक
बराबर मुकाबला करते है
बन्दूक .गोलियाँ तीर  तलवार भी
यहाँ सैकड़ों चलते है !
23
भाग खड़ी हुई अंग्रेजों की पलटन
पल भर भी खड़ी ना रह पाई
सूजा की वीरता  के आगे
सिट्टी पिट्टी गोल हो गई भाई !
24
इस युद्ध से समझ गये फिरंगी
अब दाल ना गलने पायेगी
आजाद होकर रहेगा भारत
अंग्रेजी  सरकार ना टिकने पायेगी !
25
कई वीर घायल हुए
शहीद हुए कई  सरदार
घायल होकर भी हँसती थी
सूजा वीरांगना सी गुलनार !
26
20 वर्षीय सूजा
तनिक नहीं घबराई
विजय परचम लहराती हुई
दादा ठाकुर के सन्मुख आई
27
ओज भरा था आंखों मैं
भुजा अभी फड़कती थी
घायल थी वीर सिंहनी
पर मन्द मन्द  मुस्काती थी !
28
गदगद हो गये बहादुर सिंह
नैन अश्रु जल भर आये
राजस्थानी पाग पहना सूजा  को
सम्मान से आसन बैठाये !
29
और गरज कर बोले ठाकुर
आज घोषणा करता हूँ
सूजा नहीं वीर सूरज सिंह
नाम आज से धरता हूँ !
30
यही नहीं बोले ठाकुर सा
जब भी सूरज सिंह आयेगा
दरबारी सहित राज परिवार खड़ा हो
सम्मान उसे दर्शायेगा !
31
पुरुष भेष मैं सदा रहेगी
कह तलवार एक कमर बांधी
आपसी और महिलाओं के झगड़े का
सब सूजा ही फैसला देगी !
32
लाडनू शहर  जय जय सूजा
जय सूरज सिंह से गूँज रहा
वीर प्रसूता लाडनू नभ मंडल
धन धन सूजा बोल रहा !
33
हर जलसे उत्सव में सूजा को
विशेष निमंत्रण मिलता था
सुख दुख सबकी सुनती
आदर भाव सरसता था !
34
65 वर्ष सूजा ने जीवन के
अपने लाडनू को दे डाले
सेवा भाव और पूर्ण समर्पण
आत्म सम्मान और शौर्यता से !
35
सन 1902.में सूजा ने
शांत भाव अंतिम शयन किया
आत्मा परमात्मा में लीन हो गई
परम धाम को गमन किया !
36
लाडनू  राज आज भी
सूजा राजपुरोहित को याद करें
वीरांगना के हर कर्म को
शत शत बार नमन करें !
37
चारण भाट गीत गाते है
लोक गीतों की नायिका है
वीर रस की बात चले तो
प्रथम सूजा की ही चर्चा है !

डा इन्दिरा  ✍






Comments

  1. ओज मई वीरांगनाओं का ओज मई चरित्र चित्रण।
    साधुवाद ।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

अब अपनी बारी

अब अपनी बारी ...नमन तुम्हे ओ वीर सपूतों
चरण नमन उस जननी को
जन्मा पुत्र सिह जियाला
धन्य कर गया धरती को !
माँ , बहन , बेटी और पत्नी
देश हिताय सब तज डाला
दूध मुंहे का मुख ना देखा
सब तज कर पी मृत्यु हाला !
रिश्ते कई शहीद कर गया
हृदय भरा हैं अश्को से
बाहर नही निकल पाते वो
कसमसा रहे सूखे लब पे !
उन्ही अश्को की तुम्हे कसम हैं
व्यर्थ ना उनको जाने देना
बूँद बूँद अपने बहते हैं
दुश्मन के लाखों बहा देना !
भोर और क्या साँझ सभी
अरि की धुँधली कर डालो
छाती फाड़ कर रक्त बहा दो
पापी की रूह कंपा डालो !
अब कदम उठाने से पहले
बार बार फिर कर सोचे
सोता सिह उठाने से
उड़ते हैं हाथो से तोते !
कसम तुम्हे हैं उस दुग्ध की
जो रग रग मेंं प्लावित हैं
उष्ण ज्वाल सा उसे तपा दो
जल जाये छूने भर से !
बातें -बातें सिर्फ ना बातें
कुछ करो कुछ कर जाओ
वो तो कर के  चले गये
अब अपनी बारी आओ ! डॉ इन्दिरा गुप्ता
स्व रचित

मिलन

मिलन ...बालपने की सखी सहेली
वृद्ध अवस्था जाय मिली
भूल गई पीड़ा जीवन की
एक दूजे से गले मिली ! वही ठहाका वही खुशी थी
बात बात पर था हँसना
बचपन की सुनी गलियों में
दोनों का पुनि जा बसना ! याद आ गई नीम निमोली
कच्ची अमिया का चखना
भरी दोपहरी घर के पीछे
गुट्टे के पत्थर चुनना ! खुद दादी हो गई है अब पर
बचपन की मीठी याद आई
एक एक बेर के खातिर
कितनी हमने करी लड़ाई ! निश्छल हँसी हुई प्रवाहित
कब बिछुड़ी थी भूल गई
कल जैसी बातैं लगती है
साथ खेल कर बड़ी हुई ! डा इन्दिरा .✍
स्व रचित

पापी पेट

पापी पेट ...भरी दोपहरी भरा हौसाला
तपन बाहर भीतर सब एक
अगन भूख की मन झुलसाती
सूरज की आग सेंकती देह ! छोटी उम्र हौसले भारी
धूप अलाव सी जला करें
कलम उठाने वाले कर जब
बोझ ग्रहस्थी आन पड़े ! और अधिक जेठ क्या जलेगा
हिय की जलन दिन रात बढे
गुड्डे गुडिया वाली उम्र जब
रिक्शे का पैडल खींच रहे ! पापी पेट क्या क्या करवा दे
ना करवाये सो कम है
भरी दोपहरिया घाम करें क्या
चूल्हा जल जाये बस ये मन है ! डा इन्दिरा .✍
स्व रचित