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चितचोर

चितचोर 💕

राधे जी के महल मैं
पहरों दियो लगाय
कोई पुरुष अंदर नहीं आवे
मुनादी करादी जाय !
भारी असमंजस पड गये कान्हा
हाय रे दय्या कैसे होगी
राधे बिन मोहे कल ना परत है
बिन देखे कैसे अब होगी !
फिर जुगत लगाई कान्हा ने
नाचन वारी को स्वांग  धरो
नख से शिख तक शृंगार करो
रति रूप सुन्दरी पड  गयो फीको !
सावरी  नार रूप पर दमके
पायल झांझर चलते बाजे
हाथ मैं खनके कंगना चूड़ियाँ
जब  लचक अचक कर चाल चलें !
नैनन में कजरा तीखौ सौ
सीधों दिल पर बार करें
तन पीताम्बर पीली साड़ी
स्वर्ण छटा अविराम सजे !
कान्हा पहुंचे राधे के घर
राधे बैठी कछु मुरझाई
नैन झुकाये इकली बैठी
सखियन के ढिग भी  ना आई !
कान्हा छम  से कूद पड़े
और नाचन की छवि दिखलाई
अचकचाय  राधे भी देखी
मन मैं भई  कछु खट्काई !
ये कौन है नाचन वारी
आज तलक तो ना देखी
जानी पहचानी सूरत लागे
मन हरखे याको मुख वेखी !
नैन से नैन मिले जब ही
राधे चकित भई भारी
कान्हा कैसे आय गये इत
बाहर इतनी पहरेदारी !
कान्हा कछु कछु नाच दिखावे
कंगना खनकावे दय्या री
हिये सजी बन माल देख के
पहचानी राधे  गिरधारी !
जुड़ी प्रीत की डोर इस तरह
टूटे से ना टूटे यारी
एक दूजे के लिये बने है
राधे -   श्याम नहीं
हम राधेश्याम है प्यारी !

डा इन्दिरा  ✍




Comments

  1. रे नटनागर कैसो ही तूं रूप रचा
    राधा के नयनो से कभी ना बचा
    अंखियन नही हिये विराजो श्याम
    इत रहो या रहो किसी और धाम
    दूजे ना पहचाने तूझे ये बात मै मानु
    मेरे अंतर नयनो मे तूं चमके ज्यों भानु ।
    सरस श्रृंगार रचना।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर मन भावन रचना ...

    ReplyDelete

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अब अपनी बारी

अब अपनी बारी ...नमन तुम्हे ओ वीर सपूतों
चरण नमन उस जननी को
जन्मा पुत्र सिह जियाला
धन्य कर गया धरती को !
माँ , बहन , बेटी और पत्नी
देश हिताय सब तज डाला
दूध मुंहे का मुख ना देखा
सब तज कर पी मृत्यु हाला !
रिश्ते कई शहीद कर गया
हृदय भरा हैं अश्को से
बाहर नही निकल पाते वो
कसमसा रहे सूखे लब पे !
उन्ही अश्को की तुम्हे कसम हैं
व्यर्थ ना उनको जाने देना
बूँद बूँद अपने बहते हैं
दुश्मन के लाखों बहा देना !
भोर और क्या साँझ सभी
अरि की धुँधली कर डालो
छाती फाड़ कर रक्त बहा दो
पापी की रूह कंपा डालो !
अब कदम उठाने से पहले
बार बार फिर कर सोचे
सोता सिह उठाने से
उड़ते हैं हाथो से तोते !
कसम तुम्हे हैं उस दुग्ध की
जो रग रग मेंं प्लावित हैं
उष्ण ज्वाल सा उसे तपा दो
जल जाये छूने भर से !
बातें -बातें सिर्फ ना बातें
कुछ करो कुछ कर जाओ
वो तो कर के  चले गये
अब अपनी बारी आओ ! डॉ इन्दिरा गुप्ता
स्व रचित

मिलन

मिलन ...बालपने की सखी सहेली
वृद्ध अवस्था जाय मिली
भूल गई पीड़ा जीवन की
एक दूजे से गले मिली ! वही ठहाका वही खुशी थी
बात बात पर था हँसना
बचपन की सुनी गलियों में
दोनों का पुनि जा बसना ! याद आ गई नीम निमोली
कच्ची अमिया का चखना
भरी दोपहरी घर के पीछे
गुट्टे के पत्थर चुनना ! खुद दादी हो गई है अब पर
बचपन की मीठी याद आई
एक एक बेर के खातिर
कितनी हमने करी लड़ाई ! निश्छल हँसी हुई प्रवाहित
कब बिछुड़ी थी भूल गई
कल जैसी बातैं लगती है
साथ खेल कर बड़ी हुई ! डा इन्दिरा .✍
स्व रचित

पापी पेट

पापी पेट ...भरी दोपहरी भरा हौसाला
तपन बाहर भीतर सब एक
अगन भूख की मन झुलसाती
सूरज की आग सेंकती देह ! छोटी उम्र हौसले भारी
धूप अलाव सी जला करें
कलम उठाने वाले कर जब
बोझ ग्रहस्थी आन पड़े ! और अधिक जेठ क्या जलेगा
हिय की जलन दिन रात बढे
गुड्डे गुडिया वाली उम्र जब
रिक्शे का पैडल खींच रहे ! पापी पेट क्या क्या करवा दे
ना करवाये सो कम है
भरी दोपहरिया घाम करें क्या
चूल्हा जल जाये बस ये मन है ! डा इन्दिरा .✍
स्व रचित