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में में

में में ....

में में ही करता रहा
में में ही किये जाय
इसी में के कारणे
में ही काटा जाये !

में ही में को ढूंढता
मैं को में की प्यास
में हटे तब ही मिटे
में मैं की ये प्यास !

में में करें क्या होत है
चाहे जितना मिमियाओ
में का कोई तर्पण नहीं
में अर्पण कर में पाओ !

डा इन्दिरा  ✍

Comments

  1. मैं का विलाप प्रचार करते लोगों को बाख़ूबी लताड़ा है ... अच्छाईयों रचना है ...

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  2. वाह वाह!!सुंदर सृजन।

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    1. अतुल्य आभार बहन शुभा जी

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पुराने खत

खुशबू जैसे लोग मिले अफसानों मैं
एक पुराना खत जो खुला अनजाने मैं ।कतरा कतरा लफ्ज बह रहे थे अंदर
स्याही अब तक गीली थी अफसानों में ।कोई आहट आज भी दस्तक देती है
जब भी फुर्सत होती है वीरानों  मैं ।अन्दर अन्दर धीरे धीरे कुछ दरक रहा
हर लम्हा खटका करता अनजाने मैं ।डा इन्दिरा✍️

इन्द्रधनुषी नार

इन्द्रधनुषी नार ...
नव रस नव रंग सरीखी
है नव रँगी नार
सात रंग के इन्द्र धनुष सा
उसके जीवन का सार !
सदा सुखद हो रंगोत्सव
ना सदा दुखद सी बात
धीमी आँच सा सुलगें
नारी का मन संसार !
स्मित सी मुस्कान सजीली
सब रंगो को भर लेती
फीकी भद्दे रंग ढाप कर
समक्ष सरस रंग रख देती !
इंद्रधनुष के सप्त रंगो से
अधिक रंग भरी दुनियाँ है
जीवन की हर श्वास भिन्न रंग
ये ही नारी की द्विविधा हें !
हर पल रंग बदलता रहता
नारी के कर्तव्यो का
एक तरफ सुर्ख चटकीला
दूजी तरफ रहा  फीका!
फूंक फूंक कर क़दम रख रही
नव रंगो को पजौख रही
द्रढ अस्मिता लेकर नारी
नव इन्द्र धनुष सँजो रही ! डा .इन्दिरा ✍

यादें

Drindiragupta. Blogspot. Inतन्हा दूर कोई अपना सायाद आ गया आज फागुन की रुत फाग जगाये सोये  भाव जगा गया आज ।हुआ सिंदूरी क्षितिज का अंचरानीले नभ मैं फैल गया यादो की ठप्पे दार चुनरिया पवन उड़ा कर खोल गया ।महक रही केसर की क्यारी तेरी यादों से भीनी चटख चटख कर कालिया महकी याद आ गई सावन की ।झिरमिर सा यादो का मेला इत उत झूले सा डोल रहा साँझ ढले कोई यायावर मन राहो से चला गया ।चुभने लगा रंग सिंदूरी रतनारे सब रंग चुभे नयन मूंद चुप होजा मनवाअब भोर कहां जो शितिज रंगे।डा इन्दिरा✍️