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गगन बजी दुंदुभी

गगन बजी दुंदुभी ....

गरज लरज ये कौन आ  धमकी
कौन आवन की बजे दुंदुभी
भगदड़ सी भई नभ के माही
जल भरे बदरा भये सुरन्गी !

पुरवाई भी छेड़न लागी
पात पात से खेलन लागी
पुहुप विहँस करें सब बतिया
कौन आ रहा हमरी गलियाँ !

पंचम स्वर मैं गाये पपीहरा
कुहुक कुहुक बोले कोयलिया
आद्र स्वर मयूर स्वर गूंजे
आओ मेघ बरसों पावसिया !

बूँद एक चातक खग मांगे
त्रसित भाव पावस ऋतु जागे
बरसों धरा तर बतर करदो
छलक जाये ज्यों भरी गगरिया !

डा .इन्दिरा ✍

Comments

  1. वाह वाह बहुत खूबसूरत दुंदुभी बजी,
    ज्यों सरगम लहरा के बरस गई
    कानों मे मिश्री सी घोल गई
    धरा को सरस कर गई।
    सरस मन भावन रचना अंलकृत ।

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    Replies
    1. स्नेहिल आभार मीता

      Delete
  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १३ जुलाई २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    ReplyDelete
  3. वाह इंदिरा जी बेहतरीन रचना

    ReplyDelete
  4. लाजवाब लेखन शैली ...और भाषा का खूबसूरत प्रयोग
    चार चांद लगा दिये रचना में ....बहुत खूब सखी

    ReplyDelete
  5. वाह ! खूबसूरत प्रयोग भाषा का, मनमोहक चित्र !

    ReplyDelete
    Replies
    1. स्नेहिल आभार मीना जी

      Delete

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अब अपनी बारी

अब अपनी बारी ...नमन तुम्हे ओ वीर सपूतों
चरण नमन उस जननी को
जन्मा पुत्र सिह जियाला
धन्य कर गया धरती को !
माँ , बहन , बेटी और पत्नी
देश हिताय सब तज डाला
दूध मुंहे का मुख ना देखा
सब तज कर पी मृत्यु हाला !
रिश्ते कई शहीद कर गया
हृदय भरा हैं अश्को से
बाहर नही निकल पाते वो
कसमसा रहे सूखे लब पे !
उन्ही अश्को की तुम्हे कसम हैं
व्यर्थ ना उनको जाने देना
बूँद बूँद अपने बहते हैं
दुश्मन के लाखों बहा देना !
भोर और क्या साँझ सभी
अरि की धुँधली कर डालो
छाती फाड़ कर रक्त बहा दो
पापी की रूह कंपा डालो !
अब कदम उठाने से पहले
बार बार फिर कर सोचे
सोता सिह उठाने से
उड़ते हैं हाथो से तोते !
कसम तुम्हे हैं उस दुग्ध की
जो रग रग मेंं प्लावित हैं
उष्ण ज्वाल सा उसे तपा दो
जल जाये छूने भर से !
बातें -बातें सिर्फ ना बातें
कुछ करो कुछ कर जाओ
वो तो कर के  चले गये
अब अपनी बारी आओ ! डॉ इन्दिरा गुप्ता
स्व रचित

मिलन

मिलन ...बालपने की सखी सहेली
वृद्ध अवस्था जाय मिली
भूल गई पीड़ा जीवन की
एक दूजे से गले मिली ! वही ठहाका वही खुशी थी
बात बात पर था हँसना
बचपन की सुनी गलियों में
दोनों का पुनि जा बसना ! याद आ गई नीम निमोली
कच्ची अमिया का चखना
भरी दोपहरी घर के पीछे
गुट्टे के पत्थर चुनना ! खुद दादी हो गई है अब पर
बचपन की मीठी याद आई
एक एक बेर के खातिर
कितनी हमने करी लड़ाई ! निश्छल हँसी हुई प्रवाहित
कब बिछुड़ी थी भूल गई
कल जैसी बातैं लगती है
साथ खेल कर बड़ी हुई ! डा इन्दिरा .✍
स्व रचित

पापी पेट

पापी पेट ...भरी दोपहरी भरा हौसाला
तपन बाहर भीतर सब एक
अगन भूख की मन झुलसाती
सूरज की आग सेंकती देह ! छोटी उम्र हौसले भारी
धूप अलाव सी जला करें
कलम उठाने वाले कर जब
बोझ ग्रहस्थी आन पड़े ! और अधिक जेठ क्या जलेगा
हिय की जलन दिन रात बढे
गुड्डे गुडिया वाली उम्र जब
रिक्शे का पैडल खींच रहे ! पापी पेट क्या क्या करवा दे
ना करवाये सो कम है
भरी दोपहरिया घाम करें क्या
चूल्हा जल जाये बस ये मन है ! डा इन्दिरा .✍
स्व रचित