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यलगार करके देख

यलगार करके देख ...

फिजाये क्यूँ बदली है
हवा का रुख क्यों धीमा है
कलम तलवार सी कर ले
जरा  यलगार करके देख !

आज भी ताब  है तुझमें
मोती सी आभ है तुझमें
खम ठोंक आगे बढ़
अभी बारूद है तुझमें !

कभी पलटे नहीं पीछे
तेरी फितरत रही ये तो
जरा सी आंधी क्या आई
कदम पीछे लगे रखने !

जरा ठहरो हिय झांको
समंदर ले रहा लहरें
सिपाही हो कलम के तुम
मसि  सैलाब बहने दो !

डा .इन्दिरा .✍

Comments

  1. फिजाये क्यूँ बदली है
    हवा का रुख क्यों धीमा है
    कलम तलवार सी कर ले
    जरा यलगार करके देख !
    बेहतरीन रचना इंदिरा जी कलम की ताकत को सही रूप दिया

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  2. वाह क्या बात है...
    जरा ठहरो हिय झांको
    समंदर ले रहा लहरें
    सिपाही हो कलम के तुम
    मसि सैलाब बहने दो !...
    बहुत बढ़िया👌👌👌👏👏👏

    ReplyDelete
  3. बहुत शानदार रचना ....बेहद दिलकश अंदाज 👌👌👌

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मिलन

मिलन ...बालपने की सखी सहेली
वृद्ध अवस्था जाय मिली
भूल गई पीड़ा जीवन की
एक दूजे से गले मिली ! वही ठहाका वही खुशी थी
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कच्ची अमिया का चखना
भरी दोपहरी घर के पीछे
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कितनी हमने करी लड़ाई ! निश्छल हँसी हुई प्रवाहित
कब बिछुड़ी थी भूल गई
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स्व रचित

पुराने खत

खुशबू जैसे लोग मिले अफसानों मैं
एक पुराना खत जो खुला अनजाने मैं ।कतरा कतरा लफ्ज बह रहे थे अंदर
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हर लम्हा खटका करता अनजाने मैं ।डा इन्दिरा✍️

इन्द्रधनुषी नार

इन्द्रधनुषी नार ...
नव रस नव रंग सरीखी
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उसके जीवन का सार !
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ना सदा दुखद सी बात
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सब रंगो को भर लेती
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समक्ष सरस रंग रख देती !
इंद्रधनुष के सप्त रंगो से
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दूजी तरफ रहा  फीका!
फूंक फूंक कर क़दम रख रही
नव रंगो को पजौख रही
द्रढ अस्मिता लेकर नारी
नव इन्द्र धनुष सँजो रही ! डा .इन्दिरा ✍