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भोर तपस्वी

भोर तपस्वी ....

शान्त भोर भी एक तपस्वनी
जैसी पावन लगती है
रात रात भर करें तपस्या
प्रात: काल ही उठती है !

जल थल सबको वरद हस्त से
फिर वरदान लुटाती है
देय उजाला अग्नि पुंज को
उज्वल दिवस बनाती है !

जल , पवन और धरा विनम्र से
शान्त भाव सब ग्रहण करें
कश्यप पुत्र को पाकर सन्मुख
भर भर अंजुरी आचमन करें !

कर्म भाव दिनकर को देकर
रथ आरूढ़ कराती है
तिल भर अधिक ना तिल भर कम
ये गति ना टूटने पाती है !

डा इन्दिरा .✍

Comments

  1. बेहतरीन रचना इंदिरा जी

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  2. कश्यप पत्र सूर्य की अवगाहना करती भोर कोरी सजीली पावन सी
    वाह मीता सुंदर रचना ।

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    Replies
    1. स्नेहिल आभार

      Delete
  3. वाह!!बेहतरीन रचना प्रिय इन्द्रा जी ।

    ReplyDelete
  4. शान्त भोर भी एक तपस्वनी
    जैसी पावन लगती है
    रात रात भर करें तपस्या
    प्रात: काल ही उठती है !...
    सही बात, बेहतरीन मानवीकरण, उत्तम रचना दीदी🙏👌👌👌👏👏👏

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पुराने खत

खुशबू जैसे लोग मिले अफसानों मैं
एक पुराना खत जो खुला अनजाने मैं ।कतरा कतरा लफ्ज बह रहे थे अंदर
स्याही अब तक गीली थी अफसानों में ।कोई आहट आज भी दस्तक देती है
जब भी फुर्सत होती है वीरानों  मैं ।अन्दर अन्दर धीरे धीरे कुछ दरक रहा
हर लम्हा खटका करता अनजाने मैं ।डा इन्दिरा✍️

मिलन

मिलन ...बालपने की सखी सहेली
वृद्ध अवस्था जाय मिली
भूल गई पीड़ा जीवन की
एक दूजे से गले मिली ! वही ठहाका वही खुशी थी
बात बात पर था हँसना
बचपन की सुनी गलियों में
दोनों का पुनि जा बसना ! याद आ गई नीम निमोली
कच्ची अमिया का चखना
भरी दोपहरी घर के पीछे
गुट्टे के पत्थर चुनना ! खुद दादी हो गई है अब पर
बचपन की मीठी याद आई
एक एक बेर के खातिर
कितनी हमने करी लड़ाई ! निश्छल हँसी हुई प्रवाहित
कब बिछुड़ी थी भूल गई
कल जैसी बातैं लगती है
साथ खेल कर बड़ी हुई ! डा इन्दिरा .✍
स्व रचित

इन्द्रधनुषी नार

इन्द्रधनुषी नार ...
नव रस नव रंग सरीखी
है नव रँगी नार
सात रंग के इन्द्र धनुष सा
उसके जीवन का सार !
सदा सुखद हो रंगोत्सव
ना सदा दुखद सी बात
धीमी आँच सा सुलगें
नारी का मन संसार !
स्मित सी मुस्कान सजीली
सब रंगो को भर लेती
फीकी भद्दे रंग ढाप कर
समक्ष सरस रंग रख देती !
इंद्रधनुष के सप्त रंगो से
अधिक रंग भरी दुनियाँ है
जीवन की हर श्वास भिन्न रंग
ये ही नारी की द्विविधा हें !
हर पल रंग बदलता रहता
नारी के कर्तव्यो का
एक तरफ सुर्ख चटकीला
दूजी तरफ रहा  फीका!
फूंक फूंक कर क़दम रख रही
नव रंगो को पजौख रही
द्रढ अस्मिता लेकर नारी
नव इन्द्र धनुष सँजो रही ! डा .इन्दिरा ✍