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सन्नाटा

सन्नाटा ..

खामोशी में सन्नाटा है
और ना जाने  क्या क्या बात
उसने आंखों में ना देखा
क्या क्या करती थी सम्वाद !
जरा कहीं आहट सी होती
मन के झट से द्वार खुले
सूनी गलियां सूना चौबारा
लो फिर जागी आस धुले !
हवा का चलना प्रष्ठ उलटना
अब तो मुझको खलता है
धीरे धीरे लफ्ज लफ्ज में
जाने क्या क्या बहता है !

डा इन्दिरा  ✍

Comments

  1. वाह!!बहुत खूब।

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  2. न तमन्ना न आरज़ू न कोई अरमान
    न ख्याल ही है कोई आने जाने का
    न शोर न खुशी, ना ही कोई गम है
    बस चिखता है सन्नाटा इंतजार का।।

    बहुत खूब सन्नाटा।

    ReplyDelete
    Replies
    1. वाह मीता रचना से अधिक बेहतरीन प्रतिक्रिया

      Delete
  3. वाह सखी खामोशी के सन्नाटे को सुंदरता से वर्णित किया।👌👌👌👌🌺🌹🌺

    ReplyDelete
    Replies
    1. स्नेहिल आभार सखी

      Delete

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अब अपनी बारी

अब अपनी बारी ...नमन तुम्हे ओ वीर सपूतों
चरण नमन उस जननी को
जन्मा पुत्र सिह जियाला
धन्य कर गया धरती को !
माँ , बहन , बेटी और पत्नी
देश हिताय सब तज डाला
दूध मुंहे का मुख ना देखा
सब तज कर पी मृत्यु हाला !
रिश्ते कई शहीद कर गया
हृदय भरा हैं अश्को से
बाहर नही निकल पाते वो
कसमसा रहे सूखे लब पे !
उन्ही अश्को की तुम्हे कसम हैं
व्यर्थ ना उनको जाने देना
बूँद बूँद अपने बहते हैं
दुश्मन के लाखों बहा देना !
भोर और क्या साँझ सभी
अरि की धुँधली कर डालो
छाती फाड़ कर रक्त बहा दो
पापी की रूह कंपा डालो !
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बार बार फिर कर सोचे
सोता सिह उठाने से
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जो रग रग मेंं प्लावित हैं
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बातें -बातें सिर्फ ना बातें
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स्व रचित

मिलन

मिलन ...बालपने की सखी सहेली
वृद्ध अवस्था जाय मिली
भूल गई पीड़ा जीवन की
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स्व रचित

पापी पेट

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हिय की जलन दिन रात बढे
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रिक्शे का पैडल खींच रहे ! पापी पेट क्या क्या करवा दे
ना करवाये सो कम है
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स्व रचित