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साँझ ढले

साँझ ढले ..

साँझ ढले ही
आ जाती है
हर जलते दीपक के साथ
यादै जलती
धीरे धीरे
हर जलते दीपक के साथ !
साँझ अकेली
बैठी बैठी
सोच रही एक ही बात
कौन दे गया
जाते जाते
जीवन भर का ये अवसाद !

डा इन्दिरा  .✍

Comments

  1. अतल गहराई से निकलती भावनाओं की लौ, जलते दीपक के साथ!

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    1. अति आभार आपकी प्रतिक्रिया लेखन का वजन बढ़ा गई .🙏

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  2. अंतस के दर्द की भाव पूर्ण अभिव्यक्ति प्रिय इंदिरा जी | सस्नेह |

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    1. प्रिय रेनू जी भाव पूर्ण स्नेह का शुक्रिया

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  3. वाह मीता!
    दर्द ही है यादों की सौगात
    न पुछो कब न पुछो कौन ।

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    1. आभार मीता ....ये तो सौगातें है अपने ही दे जाये .
      और पराये की क्या जुर्रत
      दे जाये कोई मौन !

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १ जून २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. वाह अति उत्तम👌👌👌👌

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  6. सुंदर कविता.
    ढली शाम तो यादों के नाम है ..
    आराम कब करे कोई
    जो मोहब्बत करे कोई
    दिन भी उसी चाहत के नाम है .

    कविता और मैं

    .

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  7. लाजवाब रचना...
    दीपक के साथ यादों का जलना...
    वाह!!!

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