साँझ ढले May 30, 2018 साँझ ढले .. साँझ ढले ही आ जाती है हर जलते दीपक के साथ यादै जलती धीरे धीरे हर जलते दीपक के साथ ! साँझ अकेली बैठी बैठी सोच रही एक ही बात कौन दे गया जाते जाते जीवन भर का ये अवसाद ! डा इन्दिरा .✍ Share Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps Share Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps Comments विश्वमोहन30 May 2018 at 10:11अतल गहराई से निकलती भावनाओं की लौ, जलते दीपक के साथ!ReplyDeleteRepliesdrindira .blogspot .com30 May 2018 at 21:39अति आभार आपकी प्रतिक्रिया लेखन का वजन बढ़ा गई .🙏DeleteRepliesReplyReplyरेणु30 May 2018 at 10:46अंतस के दर्द की भाव पूर्ण अभिव्यक्ति प्रिय इंदिरा जी | सस्नेह |ReplyDeleteRepliesdrindira .blogspot .com30 May 2018 at 21:41प्रिय रेनू जी भाव पूर्ण स्नेह का शुक्रिया DeleteRepliesReplyReplyमन की वीणा30 May 2018 at 20:30वाह मीता! दर्द ही है यादों की सौगात न पुछो कब न पुछो कौन ।ReplyDeleteRepliesdrindira .blogspot .com30 May 2018 at 21:43आभार मीता ....ये तो सौगातें है अपने ही दे जाये .और पराये की क्या जुर्रत दे जाये कोई मौन ! DeleteRepliesReplyReplySweta sinha31 May 2018 at 02:59जी नमस्ते,आपकी लिखी रचना शुक्रवार १ जून २०१८ के लिए साझा की गयी हैपांच लिंकों का आनंद पर...आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।ReplyDeleteRepliesdrindira .blogspot .com31 May 2018 at 05:09स्नेहिल आभार DeleteRepliesReplyReplyMalti Mishra31 May 2018 at 22:43वाह अति उत्तम👌👌👌👌ReplyDeleteRepliesdrindira .blogspot .com31 May 2018 at 23:09स्नेहिल आभार DeleteRepliesReplyReplyRohitas Ghorela1 June 2018 at 03:34सुंदर कविता.ढली शाम तो यादों के नाम है ..आराम कब करे कोईजो मोहब्बत करे कोई दिन भी उसी चाहत के नाम है .कविता और मैं .ReplyDeleteRepliesReplySudha Devrani1 June 2018 at 10:01लाजवाब रचना...दीपक के साथ यादों का जलना...वाह!!!ReplyDeleteRepliesReplyAdd commentLoad more... Post a Comment
अतल गहराई से निकलती भावनाओं की लौ, जलते दीपक के साथ!
ReplyDeleteअति आभार आपकी प्रतिक्रिया लेखन का वजन बढ़ा गई .🙏
Deleteअंतस के दर्द की भाव पूर्ण अभिव्यक्ति प्रिय इंदिरा जी | सस्नेह |
ReplyDeleteप्रिय रेनू जी भाव पूर्ण स्नेह का शुक्रिया
Deleteवाह मीता!
ReplyDeleteदर्द ही है यादों की सौगात
न पुछो कब न पुछो कौन ।
आभार मीता ....ये तो सौगातें है अपने ही दे जाये .
Deleteऔर पराये की क्या जुर्रत
दे जाये कोई मौन !
जी नमस्ते,
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना शुक्रवार १ जून २०१८ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।
स्नेहिल आभार
Deleteवाह अति उत्तम👌👌👌👌
ReplyDeleteस्नेहिल आभार
Deleteसुंदर कविता.
ReplyDeleteढली शाम तो यादों के नाम है ..
आराम कब करे कोई
जो मोहब्बत करे कोई
दिन भी उसी चाहत के नाम है .
कविता और मैं
.
लाजवाब रचना...
ReplyDeleteदीपक के साथ यादों का जलना...
वाह!!!