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में में

में में ...

चीत्कार मूक प्राणियों का
गूंज रहा नभ हो के आर्त
कैसे हो फिर गुंजित
मुबारकबाद का ये निनाद !

दलदल पर महल नहीं चिनते
ना कोहरे से तस्वीर बने
आघात दिये ना पूजन हो
ना शंख स्वर शमशान बजे !

में में का ये कर्कश सा स्वर
आक्रोश स्वर मैं गूंज रहा
सोचो समझो तब कर्म करो
में स्वयं तुम्हें हर पल  कहता !

डा .इन्दिरा .✍

Comments

  1. मर्मस्पर्शी रचना

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  2. मूक निरीह हों का आर्तनाद
    और समझदारों का उत्सव ।
    कौन पशु कौन इंसान।

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  3. लाजवाब लेखन सखी
    कविता के माध्यम से सुन्दर संदेश और सीख
    सार्थक लेखन

    ReplyDelete
  4. .

    चीत्कार मूक प्राणियों का
    गूंज रहा नभ हो के आर्त
    कैसे हो फिर गुंजित
    मुबारकबाद का ये निनाद !
    .
    बहुत ही गहरे और सराहनीय भाव

    ReplyDelete

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