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मधुशाला

मधुशाला ...

मधुशाला जो मधु छलकाये
सूखे हिय रस धार बहे
सूने मन पायल सी छनके
छलक छलक मधु जाम बहे !

या विरहन का प्रेम पियासा
अश्क भरा मय का प्याला
पीकर मन मतवाला होता
भूले  विरह  तप्त ज्वाला !

या गजगामिनी चले भामिनी
मद मतंग सी मतवाली
चषक भरा रति भाव सरीखा
पीता जाता पीने वाला !

कभी लगे ज्ञान गंगा सी
शान्त भाव लिऐ हाला
सुख दुख सब विस्मृत कर देती
काबा काशी सी मधुशाला !

डॉ इन्दिरा गुप्ता
स्व रचित

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